
संयुक्त राष्ट्र (UN) की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक शांति, सुरक्षा और सहयोग को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से हुई थी। भारत, जो स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही UN का सदस्य बना, ने इस अंतर्राष्ट्रीय संगठन के इतिहास में एक गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ा है। आज तक, भारत न केवल एक सक्रिय भागीदार के रूप में काम किया है, बल्कि वैश्विक शांति, विकास और न्याय के लिए एक नैतिक आवाज़ के रूप में भी उभरा है। UN में भारत की भूमिका केवल राजनीतिक या आर्थिक स्तर तक सीमित नहीं है — यह एक सिद्धांत-आधारित, दूरदर्शी और बहुआयामी योगदान है, जिसे “अभूतपूर्व” कहा जाना चाहिए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: स्वतंत्रता और संयुक्त राष्ट्र का एक साथ उदय
भारत 30 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र का 51वां सदस्य बना, जबकि अभी देश को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई थी। यह विशेष बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने UN चार्टर पर हस्ताक्षर करने वाला एकमात्र गैर-स्वतंत्र राष्ट्र था। इस समय कांग्रेस ने यह दलील दी कि भारत का युद्ध प्रयास में महत्वपूर्ण योगदान था, और इसलिए इसे नए वैश्विक व्यवस्था में स्थान मिलना चाहिए। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह कदम भारत के वैश्विक नागरिकता की प्रतिबद्धता का प्रारंभिक संकेत था।
स्वतंत्रता के बाद, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने निरपेक्ष निष्पक्षता (Non-Alignment) की नीति को अपनाया, जो UN के तटस्थता और अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रति समर्थन के सिद्धांतों से पूरी तरह संरेखित थी। नेहरू ने UN को एक ऐसा मंच बताया जहाँ छोटे और विकासशील देश भी अपनी आवाज़ उठा सकते हैं।
शांति सैनिकों के रूप में भारत का अग्रणी योगदान
UN शांति अभियानों में भारत का योगदान किसी भी अन्य देश से अधिक है। 1948 में जब पहली बार UN शांति सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात किया गया, तब से लेकर आज तक, भारत ने 50 से अधिक शांति अभियानों में लगभग 2,50,000 से अधिक कर्मियों को भेजा है। संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, भारत अब तक सबसे अधिक शांति सैनिकों का योगदान देने वाला देश रहा है।
इन अभियानों में से कई में भारतीय सैनिकों ने अपना जीवन गँवाया। उदाहरण के लिए, 1961 में कांगो में लेफ्टिनेंट जनरल शेरदील सिंह के नेतृत्व में भारतीय बटालियन ने सुरक्षा परिषद के आदेश के तहत एक जटिल सैन्य अभियान का संचालन किया। यह अभियान न केवल सैन्य रूप से सफल रहा, बल्कि UN शांति अभियानों के दायरे को विस्तारित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हाल के वर्षों में, भारत ने न केवल सैनिकों का योगदान दिया, बल्कि महिला शांति सैनिक दलों (All-Women Contingents) के माध्यम से लैंगिक समानता के मानकों को भी बढ़ावा दिया। 2007 में लिबेरिया में तैनात भारत की पहली महिला शांति दल ने वैश्विक स्तर पर महिला सशक्तिकरण के लिए एक मील का पत्थर स्थापित किया।
सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग: एक न्यायसंगत आवाज़
एक ऐसे देश के रूप में जो विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक आबादी, एक बड़ी अर्थव्यवस्था और लगातार बढ़ती वैश्विक प्रभावशीलता का प्रतिनिधित्व करता है, भारत का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता की मांग पूरी तरह वैध है। वर्तमान UNSC संरचना, जो 1945 के बाद से लगभग अपरिवर्तित रही है, आधुनिक वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती।
भारत G4 देशों (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) का हिस्सा है, जो सुरक्षा परिषद के सुधार की वकालत करते हैं। UN सुधार पर G4 की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ये देश एक दूसरे की स्थायी सदस्यता की मांग का समर्थन करते हैं। भारत की मांग को अफ्रीकी संघ, ASEAN और कई अन्य क्षेत्रीय समूहों द्वारा समर्थन प्राप्त है।
हालाँकि, स्थायी सदस्यता के लिए पाँच मौजूदा स्थायी सदस्यों (P5) की सहमति आवश्यक है, जो कई बार विरोधाभासी रही है। फिर भी, भारत अपने लगातार योगदान, विश्वसनीयता और बहुपक्षवाद के प्रति प्रतिबद्धता के कारण वैश्विक समर्थन जुटाने में सफल रहा है।
विकास एजेंडा में भारत का नेतृत्व: SDGs से लेकर जलवायु कार्रवाई तक
भारत ने केवल शांति अभियानों तक ही अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी, बल्कि वैश्विक विकास एजेंडा में भी एक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरा है। सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के कार्यान्वयन में, भारत ने घरेलू स्तर पर कई महत्वाकांक्षी पहलें शुरू की हैं, जैसे स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना और जन धन योजना। UNDP की रिपोर्ट बताती है कि भारत की इन पहलों ने SDG 1 (गरीबी में कमी), SDG 6 (स्वच्छ जल) और SDG 11 (सतत शहर) में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर भी भारत ने वैश्विक नेतृत्व दिखाया है। इंटरनेशनल सोलर एलायंस (ISA) की स्थापना भारत और फ्रांस द्वारा COP21 के दौरान की गई, जो अब UN के साथ एक साझा भागीदारी में काम कर रहा है। इंटरनेशनल सोलर एलायंस की आधिकारिक वेबसाइट पर उल्लेखित है कि ISA का लक्ष्य उष्णकटिबंधीय देशों में सौर ऊर्जा के विस्तार को बढ़ावा देना है, जो SDG 7 (सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा) के लिए महत्वपूर्ण है।
मानवाधिकार और लचीले बहुसांस्कृतिकता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता
भारत की UN में भूमिका का एक महत्वपूर्ण पहलू उसकी मानवाधिकारों के प्रति दृष्टिकोण है। भारत ने न केवल वैश्विक मानवाधिकार घोषणा के निर्माण में भाग लिया, बल्कि विकासशील देशों के संदर्भ में “विकास का अधिकार” जैसे अवधारणाओं को बढ़ावा दिया। OHCHR (कार्यालय ऑफ द हाई कमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स) के अनुसार, भारत की दृष्टि मानवाधिकारों को सार्वभौमिक और अखंड मानती है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में सांस्कृतिक और आर्थिक संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक मानती है।
साथ ही, भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान ने UN में “संवाद ऑफ सिविलाइजेशन्स” जैसे प्रयासों को मजबूत किया है। भारत ने योग, आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को वैश्विक मंच पर लाकर सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध किया है। यही कारण है कि 2014 में UN महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया, जो भारत के प्रस्ताव पर आधारित था।
वित्तीय योगदान और तकनीकी सहयोग
भारत न केवल शांति सैनिकों का योगदान देता है, बल्कि UN के बजट में भी महत्वपूर्ण वित्तीय योगदान करता है। UN के नियमित बजट के अनुसार, भारत वर्तमान में विश्व के शीर्ष 25 योगदाताओं में शामिल है। यह योगदान भारत की आर्थिक क्षमता के अनुसार निर्धारित किया जाता है, और यह विकासशील देशों के बीच सबसे अधिक है।
इसके अलावा, भारत ने तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत द्वारा शुरू किए गए ITEC (भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम) के तहत हजारों विदेशी छात्रों को प्रशिक्षण दिया गया है। इसके अलावा, भारत ने UN के तहत आपदा प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता जैसे क्षेत्रों में भी विशेषज्ञता साझा की है।
भारत बनाम अन्य प्रमुख UN योगदाता: तुलनात्मक विश्लेषण
भारत की UN में भूमिका को बेहतर ढंग से समझने के लिए, इसकी तुलना कुछ अन्य प्रमुख देशों से करना उपयोगी है। नीचे दी गई तालिका विभिन्न आयामों पर भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और ब्राजील की भूमिका की तुलना करती है:
भारत और अन्य प्रमुख देशों की UN में भूमिका: एक तुलनात्मक दृष्टिकोण
| मापदंड | भारत | संयुक्त राज्य अमेरिका | चीन | ब्राजील |
|---|---|---|---|---|
| UNSC स्थायी सदस्यता | नहीं (मांगकर्ता) | हाँ | हाँ | नहीं (G4 का सदस्य) |
| शांति सैनिक योगदान (कुल) | ~2,50,000+ (सर्वाधिक) | ~80,000 | ~2,500 | ~50,000 |
| बजट योगदान (2024) | लगभग 0.9% | 22% | 15.25% | 0.7% |
| SDG कार्यान्वयन पर जोर | अत्यधिक (घरेलू पहलों के माध्यम से) | मध्यम | उच्च | उच्च |
| जलवायु कार्रवाई में भूमिका | नेतृत्वकर्ता (ISA के माध्यम से) | अस्थिर (नीति परिवर्तन) | उच्च (लेकिन कोयला निर्भरता) | उच्च (अमेज़न संरक्षण पर जोर) |
| मानवाधिकार दृष्टिकोण | सांदर्भिक एवं विकास-केंद्रित | सार्वभौमिक और राजनीतिक | राज्य-केंद्रित | समावेशी और लैटिन अमेरिकी दृष्टि |
तालिका से स्पष्ट है कि भारत की UN में भूमिका अद्वितीय है — यह न तो एक सुपरपावर की तरह काम करता है, न ही केवल एक विकासशील देश की तरह। बल्कि, यह एक “वैश्विक दायित्व से युक्त विकासशील अर्थव्यवस्था” के रूप में कार्य करता है।
भारत के सामने चुनौतियाँ: भू-राजनीति और आंतरिक संतुलन
हालाँकि भारत का योगदान सराहनीय है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ भी हैं। भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, विशेषकर चीन के साथ, UN मंच पर भारत की स्थिति को कठिन बना देती है। उदाहरण के लिए, चीन ने कई बार भारत की UNSC स्थायी सदस्यता की मांग का विरोध किया है।
इसके अलावा, भारत को अपनी आंतरिक विकास आवश्यकताओं और वैश्विक दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखना है। UN में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए अधिक संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो एक विकासशील देश के लिए हमेशा आसान नहीं होता। फिर भी, भारत की रणनीति लगातार इस दिशा में रही है कि वैश्विक योगदान और घरेलू प्राथमिकताएँ एक-दूसरे के पूरक हों।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: क्या भारत UN सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन सकता है?
हाँ, लेकिन इसके लिए UN चार्टर में संशोधन की आवश्यकता है, जिसे P5 देशों के समर्थन के बिना पारित नहीं किया जा सकता। भारत वैश्विक समर्थन जुटाने की रणनीति पर काम कर रहा है।
प्रश्न 2: भारत ने अब तक सबसे अधिक शांति सैनिक क्यों भेजे हैं?
भारत के सैन्य बलों की विश्वसनीयता, तटस्थता और अनुशासन के कारण UN अक्सर भारतीय दलों पर भरोसा करता है। साथ ही, भारत का बहुसांस्कृतिक समाज अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में अनुकूलन करने में सक्षम है।
प्रश्न 3: क्या भारत UN के बजट में अपना हिस्सा देता है?
हाँ, भारत UN के नियमित बजट और शांति अभियान बजट दोनों में वित्तीय योगदान देता है।
प्रश्न 4: क्या भारत का UN में कोई अन्य भूमिका है?
हाँ, भारत कई UN एजेंसियों जैसे WHO, FAO, UNESCO और ILO के कार्यकारी बोर्डों में सक्रिय रूप से भाग लेता है।
प्रश्न 5: क्या भारत का हस्ताक्षर UN चार्टर पर स्वतंत्रता से पहले हुआ था?
हाँ, भारत ने 26 जून, 1945 को UN चार्टर पर हस्ताक्षर किए, जबकि स्वतंत्रता 15 अगस्त, 1947 को मिली।
निष्कर्ष: एक दायित्वशील वैश्विक नागरिक के रूप में भारत
भारत की संयुक्त राष्ट्र में भूमिका केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं है — यह एक दार्शनिक और नैतिक दृष्टिकोण का परिणाम है जो “वसुधैव कुटुम्बकम” (संसार एक परिवार है) की प्राचीन भारतीय अवधारणा से प्रेरित है। UN में भारत का योगदान न केवल मात्रात्मक है, बल्कि गुणात्मक रूप से भी अद्वितीय है। चाहे वह शांति सैनिकों के रूप में जीवन का बलिदान हो, SDG कार्यान्वयन के लिए घरेलू सुधार हों, या जलवायु कार्रवाई के लिए नए गठबंधन — हर कदम पर भारत ने वैश्विक समुदाय के प्रति अपने दायित्व को साकार किया है।
आने वाले वर्षों में, जैसे-जैसे वैश्विक चुनौतियाँ जटिल होती जाएंगी — चाहे वह महामारी हो, जलवायु संकट हो या साइबर युद्ध — भारत की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत केवल एक सदस्य नहीं है; यह एक सह-निर्माता, एक विश्वासपात्र और एक आशा की किरण है। और इस भूमिका को आगे बढ़ाते हुए, भारत न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा, बल्कि एक समान, न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण विश्व के निर्माण में भी अपना योगदान देगा।