
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा का मुद्दा लंबे समय से द्विपक्षीय संबंधों का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है। जबकि 2015 में हस्ताक्षरित लैंड बॉर्डर एग्रीमेंट (LBA) ने कई लंबित मुद्दों को सुलझाया, 2025 में भी कुछ संवेदनशील और जटिल पहलू शेष हैं, जो दोनों देशों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहे हैं। यह ब्लॉग पोस्ट बांग्लादेश सीमा विवाद के 2025 के संदर्भ में घटनाक्रमों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्तमान स्थिति, विशेषज्ञ विश्लेषण और संभावित समाधानों की एक व्यापक झलक प्रस्तुत करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सीमा विवाद की जड़ें
भारत-बांग्लादेश सीमा की समस्या मुख्य रूप से 1947 के भारत विभाजन और 1971 के बांग्लादेश के निर्माण से जुड़ी है। ब्रिटिश शासन काल के दौरान निर्धारित अस्पष्ट और अपूर्ण सीमा रेखाओं ने वर्षों तक दोनों ओर के गांवों में भ्रम पैदा किया। विशेष रूप से, चहबाही या एन्क्लेव्स (enclaves) की समस्या ने नागरिकता, प्रशासन और सुरक्षा के क्षेत्र में गहरी जटिलताएं पैदा कीं।
इनमें से कई चहबाही ऐसे थे जहां भारतीय क्षेत्र के भीतर बांग्लादेश का भूखंड या इसके विपरीत होता था। ऐसे क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों को न तो भारत और न ही बांग्लादेश की सरकारें ठीक से प्रशासित कर पाती थीं। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अनुसार, 2015 से पहले भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 198 चहबाही थे, जिनमें से 111 भारतीय क्षेत्र में बांग्लादेश के थे और 51 बांग्लादेशी क्षेत्र में भारत के।
2015 का सीमा समझौता: एक महत्वपूर्ण मोड़
2015 में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच हुए लैंड बॉर्डर एग्रीमेंट ने इतिहास रच दिया। इस समझौते के तहत, दोनों देशों ने एक-दूसरे को चहबाही सौंप दिए और उन क्षेत्रों के निवासियों को नागरिकता चुनने का अधिकार दिया गया। यह समझौता न केवल एक कूटनीतिक विजय था, बल्कि मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।
इस समझौते के बाद, भारत ने लगभग 17,000 एकड़ भूमि बांग्लादेश को सौंपी, जबकि बांग्लादेश ने भारत को लगभग 7,000 एकड़ भूमि दी। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत लगभग 37,000 लोगों को नई नागरिकता मिली। यह समझौता काफी हद तक सीमा विवाद को सुलझाने में सफल रहा।
2025 में उभरती चुनौतियां
हालांकि 2015 के समझौते ने चहबाही वाले विवादों को समाप्त कर दिया, लेकिन 2025 में कुछ नए और पुराने मुद्दे फिर से चर्चा में आए हैं:
1. असम के धुबरी और बांग्लादेश के कुरिग्राम के बीच सीमा अंकन का विवाद
ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित यह क्षेत्र लंबे समय से संवेदनशील रहा है। नदी के बदलते मार्ग ने भूमि के नियंत्रण पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत का तर्क है कि बांग्लादेश ने कुछ भूमि कब्जे में कर ली है, जबकि ढाका का कहना है कि यह प्राकृतिक परिवर्तन का परिणाम है। भारतीय सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने हाल के महीनों में इस क्षेत्र में अपनी गश्त बढ़ा दी है।
2. अवैध आप्रवासन और तस्करी
सीमा के कुछ हिस्सों में अवैध आप्रवासन, नशीली दवाओं और हथियारों की तस्करी अभी भी चिंता का विषय है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर तस्करी नेटवर्क अत्यधिक संगठित हैं और स्थानीय अपराधी गिरोहों के साथ सहयोग करते हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए दोनों देशों ने संयुक्त सीमा प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौतियां बनी हुई हैं।
3. सीमा पर आर्थिक सहयोग की कमी
2015 के बाद भी, सीमा के आसपास के क्षेत्र आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। भारतीय नीति आयोग की एक अध्ययन रिपोर्ट बताती है कि सीमा के दोनों ओर के स्थानीय निवासी सीमा व्यापार या आर्थिक सहयोग के लाभ से वंचित हैं। यदि दोनों देश सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा विकसित करें, तो इससे न केवल अवैध गतिविधियां कम होंगी, बल्कि सामाजिक स्थिरता भी बढ़ेगी।
विशेषज्ञ विश्लेषण: क्या कहते हैं रणनीतिक विश्लेषक?
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा विवाद अब भू-राजनीतिक या सैन्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक और तकनीकी प्रकृति का है। नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के एक अध्ययन में कहा गया है कि दोनों देशों को GPS-आधारित सीमा अंकन और ड्रोन निगरानी जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके सीमा प्रबंधन को मजबूत करना चाहिए।
इसी तरह, ढाका स्थित बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज (BISS) का कहना है कि सीमा मुद्दों को सुलझाने में विलंब से दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी पैदा हो सकती है। विशेष रूप से, जलवायु परिवर्तन के कारण ब्रह्मपुत्र और पद्मा नदियों के किनारों पर बसे गांवों में सीमा स्पष्ट नहीं हैं, जो भविष्य में अधिक विवाद पैदा कर सकता है।
भारत बनाम बांग्लादेश: सीमा विवाद के मुख्य बिंदुओं की तुलना
| मुद्दा | भारत का दृष्टिकोण | बांग्लादेश का दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| चहबाही (Enclaves) | 2015 समझौते के बाद समाप्त | 2015 समझौते के बाद समाप्त |
| अवैध आप्रवासन | सुरक्षा खतरा; NRC और CAA का हवाला | अतिरंजित; आंकड़े अस्पष्ट |
| नदी परिवर्तन के कारण सीमा परिवर्तन | सीमा अंकन पुनर्स्थापित करना आवश्यक | प्राकृतिक प्रक्रिया; कोई विवाद नहीं |
| सीमा पर बुनियादी ढांचा | 40% सीमा पर बाड़ पूरी, 60% अधूरी | भारत की बाड़ के कारण गतिशीलता प्रभावित |
| सीमा व्यापार | सीमित व्यापार पोर्टल कार्यरत | सीमा व्यापार को बढ़ावा देने की मांग |
संभावित समाधान और भविष्य की राह
2025 में सीमा विवाद के समाधान के लिए कई व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं। सबसे पहले, दोनों देशों को एक संयुक्त तकनीकी समिति गठित करनी चाहिए जो नदी परिवर्तन के कारण होने वाले सीमा परिवर्तनों की निगरानी करे। दूसरे, सीमा व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त बॉर्डर हैट्स (सीमा बाजार) खोले जा सकते हैं। विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अनुसार, सीमावर्ती व्यापार द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
तीसरे, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए, दोनों देशों को एक संयुक्त जलवायु अनुकूलन योजना तैयार करनी चाहिए, जिसमें सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान शामिल हों।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: क्या 2025 में बांग्लादेश सीमा विवाद गंभीर है?
उत्तर: 2025 में विवाद का स्वरूप गंभीर नहीं है, लेकिन कुछ प्रशासनिक और तकनीकी मुद्दे शेष हैं, जिनके समाधान की आवश्यकता है।
प्रश्न 2: क्या अवैध आप्रवासन अभी भी एक समस्या है?
उत्तर: हां, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और असम के कुछ क्षेत्रों में। हालांकि, दोनों देशों ने संयुक्त रूप से इसे रोकने के लिए कार्रवाई की है।
प्रश्न 3: क्या भारत और बांग्लादेश के बीच युद्ध की संभावना है?
उत्तर: नहीं, दोनों देशों के बीच मौजूदा कूटनीतिक संबंध इस तरह की स्थिति की अनुमति नहीं देते। विवादों का समाधान शांतिपूर्ण तरीकों से हो रहा है।
प्रश्न 4: 2015 के सीमा समझौते के बाद क्या बदलाव आए?
उत्तर: हां, चहबाही समाप्त हो गए, नागरिकता का मुद्दा सुलझ गया, और सीमा प्रबंधन में सुधार हुआ। हालांकि, कुछ तकनीकी मुद्दे अभी भी शेष हैं।
प्रश्न 5: क्या सीमा पर बाड़ लगाना आवश्यक है?
उत्तर: भारत का मानना है कि यह अवैध आप्रवासन और तस्करी को रोकने में मदद करता है, जबकि बांग्लादेश इसे प्राकृतिक गतिशीलता पर प्रतिबंध के रूप में देखता है।
प्रश्न 6: सीमा विवाद का स्थानीय निवासियों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: सीमा अस्पष्टता के कारण उन्हें आवागमन, कृषि और व्यापार में बाधाएं आती हैं। स्पष्ट सीमा अंकन से उनकी जीवन शैली में सुधार होगा।
प्रश्न 7: क्या नदियां सीमा बदल सकती हैं?
उत्तर: हां, विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र और पद्मा जैसी बड़ी नदियां अपना मार्ग बदल सकती हैं, जिससे सीमा रेखा प्रभावित होती है।
प्रश्न 8: क्या भारत और बांग्लादेश के बीच अन्य सीमा समझौते हैं?
उत्तर: हां, 1974 का सीमा समझौता और 2011 का जल समझौता भी महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष: सहयोग की ओर एक साझा भविष्य
2025 में बांग्लादेश सीमा विवाद कोई तीव्र या युद्धकालीन संकट नहीं है, बल्कि एक जटिल प्रशासनिक चुनौती है जिसे द्विपक्षीय विश्वास, तकनीकी सहयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से सुलझाया जा सकता है। 2015 का समझौता एक मजबूत आधार प्रदान करता है, लेकिन अब दोनों देशों को जलवायु परिवर्तन, आर्थिक एकीकरण और डिजिटल सीमा प्रबंधन जैसे नए आयामों को भी संबोधित करना होगा।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा न केवल भौगोलिक रेखा है, बल्कि सांस्कृतिक, आर्थिक और मानवीय संबंधों का प्रतीक भी है। यदि दोनों देश इस सीमा को बाधा नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखें, तो यह पूरे दक्षिण एशिया के लिए स्थिरता और समृद्धि का द्वार खोल सकती है।
अगले कदम के रूप में, नीति निर्माताओं को सीमावर्ती समुदायों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए, तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करना चाहिए और बहुपक्षीय मंचों जैसे सार्क के माध्यम से सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान करना चाहिए। इस दिशा में उठाए गए प्रत्येक कदम से न केवल सीमा सुरक्षित होगी, बल्कि उसके दोनों ओर के लाखों लोगों का जीवन भी सुधरेगा।